।।आईना।।

मैंने तो सिर्फ एक आईना बनना चाहा था,

मुझे क्या पता था कि ये दुनिया 

मेरे टूटने पर मुझे काँच ही समझ बैठेगी!

आखिर एक आईना भी तो काँच तभी

बनता है जब उसे तोड़ा जाए!

क्यों भला कोई खुद को तोड़ना चाहेगा?

क्यों भला कोई दुसरो को बेवजह दर्द देना चाहेगा?

जब कोई इंसान टूटता है,तो क्यों वो सबको चुभने 

लग जाता है?

क्यों कोई किसी को नही समझता?

क्यों कोई उसकी मदद नही करता?

आईना भी तो किसी से गिरा होगा,

किसी ने तोड़ा होगा!

एक ज़ख्मी इंसान खुद को तकलीफ नही देता,

वैसे ही एक काँच किसी के पास नही जाता

की हाँ आज मैं किसी को दर्द दूँगा!

हैरानी तो तब होती है जब ये दुनिया,

एक आईने को देख कर खुद को पहचानती है

और दूसरे ही पल,उस आईने के टूट जाने पर उसे 

फेंक देती है!

एक ज़ख़्मी इंसान को कभी कमज़ोर मत समझना,

क्यों कि एक घायल शेरनी भी वो कर सकती है

जो एक शेर सोच भी नही सकता!

ऐ दुनिया,बनना ही है तो किसी के ज़ख़्म 

का मरहम बन!

कड़ी धूप में किसी की छावं बन,

एक प्यासे की प्यास नही,पानी बन,

किसी की ख़ुशी का कारण बन!

जो मज़ा किसी और के लिये जीने में है,

वो मज़ा खुद के लिये जीने में कहाँ!

जब तक काँच हो,तब तक चुभोगे,

जिस दिन आईना बन जाओगे, पूरी दुनिया देखेगी!

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