रहस्मयी कहानियां: जब मेरे चाचा रात को चुपके से घर से निकलने लगे

उन दिनों मैं बहुत छोटा था। शायद मेरी उम्र 7 साल थी। आज से 20 साल पहले की घटना है। सितंबर-अक्टूबर के दिन थे। धान की फसल काटने का काम चल रहा था। हमारे खेत घर से 3-4 किलोमीटर दूर हैं। दरअशल दादा जी अपनी जवानी के दिनों में ही पुश्तैनी जमीन को छोड़कर इस जगह पर आकर बस गए थे, जहां हम रह रहे थे। तो घर-परिवार के लोग पैदल खेतों तक जाते, वहां पर फसल काटते और ढेर लगाकर रख देते। वहीं पर बड़े से खेत में लगी फसल की रखवाली भी करनी पड़ती। इसकी ड्यूटी चाचा की लगती थी, जो उन दिनों कॉलेज में थे। दिन में वह कॉलेज जाते और रात को उन्हें वहीं पर बने अस्थायी मचान में रुकना होता।

खेत ज्यादा थे और अनाज भी काफी होता था। तीन दिन तक करीब चाचा को रात को वहां रुकना पड़ा। इस दौरान चाचा के व्यवहार में बदलाव सा आ गया। वह खाना कम खाने लगे, हंसते-खेलते रहा करते थे, मगर अचानक गंभीर हो गए थे। किसी से बात कम करते थे और हम बच्चो को अक्सर डांट दिया करते थे। सब लोग बड़े परेशान हुए उनके व्यवहार से। इस बीच 10-15 दिन बीते और देखने को मिला की चाचा दिन ब दिन कमजोर होते जा रहे हैं। 15 दिन के अंदर वह सूखकर आधे रह गए थे। बड़े-बुजुर्गों ने पूछा कि क्या कोई दिक्कत तो नहीं। मगर उन्होंने कहा कि ठीक हूं। डॉक्टर के पास जाने से भी इनकार कर दिया।

एक रात मेरी ताई रात को बाहर निकलीं तो उन्होंने देखा कि चाचा जूते पहनकर तैयार होकर कहीं निकल रहा है। उन दिनों घर में टॉइलट बन गया था, फिर कहीं और जाने का तो सवाल भी नहीं था। मगर ताई जी ने अंदर आकर ताऊ जी को बात बताई। ताऊ ने चाचा के कमरे में जाकर देखा तो वह वाकई वहां नहीं थे। सुबह उनके आने का इंतजार किया और जब वह आए तो पूछा कि कहां गए थे। चाचा ने बोला मॉर्निंग वॉक पर। मगर जब उन्हें बताया कि तुम्हारी भाभी ने तुम्हें तो रात को ही निकलते देखा था, इस पर चाचा ने कोई जवाब नहीं दिया और अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया।

अगली रात ताऊ जी ने मेरे पापा के साथ मिलकर योजना बनाई कि देखें कि ये जाता कहां है। रात को फिर डेढ़ बजे के करीब चाचा अपने कमरे से निकला और जूते पहनकर निकल पड़ा। आगे-आगे चाचा और पीछे-पीछे पापा और ताऊ। चाचा हमारे उन्हीं खेतों की तरफ चल पड़ा, जहां पर रात को वह चौकीदारी किया करता था। उन खेतों से आगे चलकर एक नाला था, चाचा उस तरफ बढ़ चला। पीछे से छिपते-छिपाते हुए ताऊ और पापा भी जा रहा था। उन्होंने देखा कि चाचा नाले में उतर गया। वे लोग आगे गए तो अंधेरे में उन्हें समझ नहीं आया कि चाचा गया कहां नाले में। वे काफी देर वहां बैठकर देखते रहे, मगर कुछ नहीं दिखा। इस बीच सुबह हो गई और वे दोनों खाली हाथ घर की तरफ लौट पड़े। घर पर आकर उन्होंने देखा कि सीढ़ियों के पास चाचा के जूते खुले पड़े हैं। कमरे में जाकर उन्होंने देखा कि चाचा वहां पर सो रहा है। वे हैरान थे कि ये कब लौटा।

परिवार में चर्चा हुई कि कुछ तो गड़बड़ है। पहले शंका थी कि कहीं किसी से चक्कर न चल रहा हो या गलत संगति में पड़कर चोरी-चकारी न करने लगा हो, मगर नाले में जाना हैरान कर रहा था। किसी ने बताया कि कुछ तो चक्कर है, इसपर किसी ने कुछ कर दिया है। रिश्तेदारों में बात हुई तो किसी ने सलाह दी कि दूर के मंदिर वाले बाबा से पूछ ली जाए। बाबा ने पूछ देकर बताया कि उसे किसी चड़ेल (चुड़ैल) ने अपने बस में किया हुआ है और वह इसका फायदा उठा रही है। यह इसीलिए सूख रहा है धीरे-धीरे और ऐसा ही रहा तो महीने घर में मर भी सकता है।

घर वाले चिंता में थे। मेरे पापा को यकीन नहीं हुआ इन बातों पर वह बात करना चाहते थे चाचा से। मगर चाचा मुंह से कोई बात नहीं करता था और कुछ पूछने पर वहां से उठकर चल दिया करता था। इस बीच एक दिन पापा कहीं बाहर गए थे काम से, पीछे से ताऊ और पड़ोस के दो अंकलों ने चाचा को पकड़ा और जबरन बाबा के मंदिर ले गए। बाबा ने वहां झाड़फूंक की, मगर चाचा बोलता रहा कि छोड़ो, मुझे कुछ नहीं हुआ। लास्ट में बाबा ने कहा कि मेरे बस का नहीं, इसे किसी और के पास ले जाओ।

चाचा को वहां से छोड़ा गया, तो चाचा बहुत नाराज हुआ। चाचा ने बोला कि मुझे कुछ नहीं हुआ है और दोबारा ऐसा किया तो घर छोड़ दूंगा। सब परेशान थे। वापस आने पर पापा को पता चला कि ऐसा हुआ है तो वह बहुत नाराज हुए। उन्होंने चाचा से बात की और बोला कि कोई बात नहीं, दोबारा ये लोग ऐसा नहीं करेंगे। तू चल मेरे साथ, कोई टेस्ट वेस्ट करवा लेते हैं कि भूख क्यों नहीं लग रही, क्यों वेट लूज़ हो रहा है। चाचा को बोला पापा ने कि कल सुबह चलेंगे। उस वक्त चाचा ने कुछ नहीं कहा। रात को उनके कमरे का दरवाजा बंद कर दिया था कि वह बाहर न निकले। मगर अगली सुबह लोग उठे तो चाचा के कमरे का दरवाजा खुला था वह वहां था ही नहीं।

सबने उन्हें ढूंढने की कोशिश की तो दोपहर तक पता चला कि वह खेतों में गिरा पड़ा है। पड़ोसियों को वहां पर गिरा नजर आया था। उसी जगह पर, जहां पर रात को पहरेदारी करता था। अब सबको कुछ लगा कि मामला गड़बड़ है। पापा ने भी ज्यादा बचाव करना छोड़ दिया था। इतने में चाचा को एक मंदिर (याद नहीं कौन सा) ले जाया गया, जहां की पुजारिन भूत-प्रेत उतारने में माहिर थी। मंदिरों पर मुझे तो नहीं ले जाते थे, मगर बाद में परिवार वालों से जो पता चला, उसी का जिक्र आपके साथ कर रहा हूं। तो वहां पर उस पुजारिन ने चाचा के ऊपर पानी फेंका और चाचा अजीब तरह से हंसने लगा। दोहरी सी आवाज। मानो पुरुष और स्त्री दोनों हंस रहे हों। पुजारिन ने उससे पूछा कि कौन है तू, क्या चाहता है।

इतने में चाचा ने बोला कि मैं तो मैं ही हूं, कोई नहीं है मेरे ऊपर। पर मुझे हंसी ये आ रही है कि तू ढोंग करती है पुजारिन होने की, तुझे तो पता ही नहीं है कि समस्या क्या है। तू भूत-प्रेत ढूंढ रही है मुझमें और मेरे अंदर कोई भूत नहीं है। और इलाज करना है तो मेरे घरवालों का कर, जिनका दिमाग खराब हो गया है। तू मेरी कोई मदद नहीं कर सकती, अपना और मेरा टाइम वेस्ट न कर।

पुजारिन ने 10 मिनट के लिए मौन साधा और फिर बोली- बेटा, बता तू क्या समस्या है तेरे को। समझ तो मैं गई हूं, मगर तेरे मुंह से सुनना चाहती हूं। ये माता का दरबार है, यहां तेरेको कोई डर नहीं है। चाचा यह सुनकर रोने लगा औऱ बोला मैं नहीं बोल सकता, मेरे को कसम खिलाई है। अगर मैं कुछ बोलूंगा तो मेरे पूरे परिवार को खतरा है। पुजारिन ने फिर बोला कि यहां तुझे कोई खतरा नहीं है और न ही तेरे परिवार को कुछ होगा। तू बोल।

आधे घंटे की ऐसी ही बातचीत के बाद चाचा ने जो बुलाया, उसे सुनकर वहां मौजूद लोगों के रोंगटे खड़े गए हो गए। चाचा ने बताया-

‘पहली रात मैं पहरेदारी करने गया था। जैसे ही मैं सोया, मुझे मेरे नाम से किसी महिला ने पुकारा। पहले मैंने सोचा कि मेरा भ्रम है। तो मैं सो गया आराम से। रात को कोई समस्या नहीं हुई और मैं घर आ गया सुबह। अगली रात को फिर गया तो फिर मुझे किसी ने मेरे नाम से आवाज दी। मैं इधर-उधर देखा तो मुझे झाड़ियों के पास कोई महिला सी दिखाई दी खड़ी हुई। मैं खड़ा होकर ध्यान से उस तरफ देखता हूआ। कम से कम 30-40 फुट दूर आधे से चांद की चांदनी में वह महिला खड़ी हुई दिखाई दी। मैं उसे देखता रहा गौर से। वह भी इस तरफ देख रही थी। उशने कुछ नहीं कहा बस देख रही थी। चेहरा वगैरह नजर नहीं आ हा ता, मगर ऐसा लग रहा था जैसे उसने कोई पकड़े न पहने हों। मैं करीब डेढ़ मिनट तक ऐसे ही देखता रहा। फिर मुझे ध्यान आया कि पास ही कुल्हाड़ी पड़ी है। मैंने नजर घुमाकर कुल्हाड़ी उठाई और फिर उस दिशा में देखा तो वहां कोई नहीं था। मैं परेशान था कि मुझे भ्रम हुआ था कि मैंने कोई सपना देखा था। वो रात जैसे-तैसे बीती और मुझे सुबह लगा कि रात को कोई सपना ही देखा था।

तीसरी रात और आखिरी रात को मैं अपने साथ रेडियो ले गया था। रात को नींद नहीं आ रही थी पिछली रात की घटना को याद करके। रेडियो मैं जोर से बजा रहा था ताकि कोई आवाज भी लगाए तो मुझे सुनाई न दे। नई बैटरी डाली थी, मगर आधे घंटे बाद ही रात साढ़े 12 बजे रेडियो बजना बंद हो गया। अब मैं होशियार होकर बैठ गया। हाथ में कुल्हाड़ी ले ली और उस तरफ नजर डालने लगा, जहां पिछली रात एक महिला जैसा कुछ दिखा था। अचानक झाड़ियों में हरकत हुई औऱ वहां पर फिर वही महिला आई। और इस बार वो अचानक लगातार बढ़ती हुई मेरे पास आने लगी। मन किया कि कुल्हाड़ी का वार करूं, जोर से चीखूं मगर मैं चिल्ला नहीं पाया। मैं खड़ा रहा। वह महिला पास आती रही। उसने कुछ भी नहीं पहना हुआ था। जैसे ही वह वहां आई थी, ऐसी गंध आ रही थी हवा से जैसे कि मछलियों से आती है या खड्ड की जमी हुई काई से।

उसके बाद उसने मेरे साथ गलत काम किया। मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया। और उसने मुझे बोला कि इस बारे में किसी को बताया तो मैं तेरे घर को आग लगा दूंगी और सारे परिवारवालों को मार दूंगी।’

चाचा ने ये बात रोते-रोते बताई। इसके बाद चाचा से पुजारिन ने पूछा कि तू क्यों जाता था बार-बार रात को। चाचा ने बोला कि जी वो रोज घर तक आती है मुझे लेने। मुझे उसकी आवाज सुनाई देती है कानों में और फिर खिड़की से बाहर दिखती है वो। वो आगे-आगे चलती हैौ और मैं उसके पीछे-पीछे। फिर मुझे ले जाती है वो अपने साथ नाल में। दरवाजा बंद किया हो घरवालों ने तो वह भी खुल जाता है। मैं किसी को कुछ बता नहीं पाया क्योंकि मैंने देखा है उसकी ताकत कितनी है। वह हवा में उड़ती हुई जाती है और हवां में उड़ती आती है। पानी से बीच से ले जाकर अंदर उसकी गुफा है, जहां पर उसने बहुत सारा सामान रखा हुआ है।

सांकेतिक तस्वीर।

पुजारिन ने इसके बाद मोरपंखे से कुछ मंत्र फूंककर झाफा मारा और चाचा को एक ताबीज पहनने को दिया औऱ बोला कि जब तक इसे पहनेगा, तुझे कुछ नहीं होगा। वो चुड़ैल तेरा कुछ नहीं कर पाएगी। साथ ही मेरे ताऊ जी को पोटली में कुछ दिया और बोला कि इसे गांव के चारों कोनों में दबा दो। ताऊ जी ने उसी दिन लौटकर वह काम किया और गांव के चार कोनों में वो चीजें दबाईं, जो पुजारिन ने दी थी। चाचा ने ताबीज (जंतर) पहना और बैठे रहे। उस रात को करीब 1 बजे हम सबने गांव से दूर बाहर किसी महिला के चीखने की आवाजें सुनीं। सब घरवाले उठे थे, तो मैंने भी वे अजीब सी आवाजें सुनी थीं। अगली सुबह गांववालों ने भी वे चीखें सुनीं थीं, जैसे महिला जोर-जोर से रो रही हो। उसी रात हमारे धान के कुंदलू (धान की फसल का बनाया गया ढेर) में अपने आप आग लग गई और सारी फसल तबाह हो गई।

यह सिलसिला आने वाली 7 रातों तक चलता रहा। मेरे चाचा की भूख खुल गई थी और नॉर्मल होकर बात करने लगे थे। इतने में पुजारिन के पास फिर जाकर बताया गया कि ऐसे गांव से बाहर आवाजें आती हैं। पुजारिन ने कहा कि दिवाली तक रुक जाओ। दिवाली वाली रात बस ख्याल रखना कि ये (मेरा चाचा) कहीं अकेला न जाए बाहर। दिवाली वाली रात चाचा को घर के सब सदस्यों ने चूल्हे के पास बिठाया हुआ था। अचानक उनके पेट में दर्द शुरू हो गया। इतना दर्द हुआ कि उन्हें अस्पताल ले जाने की नौबत आ गई। उन्हें पड़ोसी की जीप में बिठाकर जैसे ही अस्पताल ले जाने लगे, हमारे घर के छप्पर में अचानक आग लग गई। शुक्र मनाओ कि परिवार वाले घर से बाहर निकलकर आंगन में पहुंचे हुए थे चाचा को अस्पताल ले जाने की वजह से। अचानक छत से आग लगी और पूरा घर आग की चपेट में आ गया। कुछ लोग चाचा को अस्पताल ले गए और पड़ोसी वगैरह आग को बुझाने लग गए।

अस्पताल जाते ही चाचा को खून की उल्टियां हुईं और पता चला कि उन्हें पेट में अल्सर हो गए हैं। उनका लंबा इलाज चला और फिर ठीक हो गए। इस बीच गांव में कभी भी वे आवाजें नहीं सुनाई दीं। घर जला और बहुत सारी चीजें जलीं, मगर ऊपर वाले की कृपा से सबकुछ ठीक हो गया बाद में। परिवार इस हानि से उबर गया और आज संपन्न हालत में है। चाचा एक राष्ट्रीयकृत बैंक में मैनेजर हैं और परिवार के साथ सुखी हैं। हम अपनी जिंदगी में आगे बढ़ रहे हैं।

पता नहीं वह घटनाक्रम क्या था, मगर बचपन में अपने सामने देखा है तो रोमांचित करता ही है।

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