उन्हें कैसे भूलूँ मैं?

“जिसकी थाली में बिना खाये आज भी भूँख नहीं मिटती,

जिसकी लोरी सुने बिना आज भी नींद नहीं आती।

जिसकी दुवाओं के बिना, आज भी घर से नहीं निकलता,

जिसकी मन्त्रों वाली फूँक से, आज भी बडा से बडा दर्द दूर हो जाता।

उस प्यारी माँ के निश्चछल प्यार को कैसे भूल जाऊँ मैं!!”

 

“जिसकी जेब से आज भी पैसे चुरा लेता हूँ,

जिसकी डांट से आज भी चुप हो जाता हूँ,

जिसकी उंगली को पकड़कर, मैंने चलना सीखा है,

जिसके कन्धे पर बैठकर, मैने मेला देखा है,

उस प्यारे पिता के नि:शब्दों वाले प्यार को कैसे भूल जाऊँ मैं!!”

“खाना बनाते समय पढाई गई उसकी बातों को,

प्यार से गालों पर पड़ने वाले उसके चाँटों को।

मेरी हर जिद्द के आगे जिसने, हारना सीखा है,

मेरी सारी गलतियों को एक झटके में जिसने माफ किया है,

उस प्यारी माँ के दुलारे प्यार को कैसे भूल जाऊँ मैं!!”

 

“राँह चलते बतायी गयी अच्छी बातों को,

डाँटने के बाद, बाजार में खिलाई गई चाटों को,

मेरी खुशी को पूरा करने के लिए, जिसने अपनी खुशियाँ दबायीं हैं,

उस प्यारे पिता के गुस्से वाले प्यार को कैसे भूल जाऊँ मैं!!”

©ReemaPrabhat

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