रहस्मयी कहानियां:जब उस रात वो लड़की मेरे कमरे मे आयी।कभी नही भूल सकता वो रात

बात उन दिनों की है, जब मैं +2 करने के बाद कोचिंग लेने के लिए हमीरपुर गया था। उन दिनों चलन ऐसा था कि +2 करने के बाद प्रदेश के ज्यादातर जगहों के बच्चे इंजिनियर या डॉक्टर बनने का ख्वाब लिए इसी शहर का रुख करते थे, क्योंकि कोचिंग के लिए यह मशहूर था। नॉन-मेडिकल का स्टूडेंट रहा था, घरवालों के पास पैसे उतने नहीं थे तो चंडीगढ़ के बजाय हमीरपुर भेज दिया।

खैर, मैं कांगड़ा की ठंडी वादियों का रहने वाला और कहां हमीरपुर का गर्म वातावरण। इन्हीं दिनों कोचिंग हुआ करती थी और गर्मी में दिमाग खराब रहा करता था। बाकी लोग होस्टल में रहा करते थे, मैंने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर अणु (हमीरपुर के बाहर एक गांव) में क्वार्टर ले लिया रहने को। दिन भर हम कोचिंग करते और फिर घर पर आकर दोहराते कि दिन में क्या पढ़ा। सारा कुछ सिर के ऊपर से जाता था। बस अगले मॉक टेस्ट की तैयारी में वक्त बीतता रहता था। गर्मी होने की वजह से रात को खिड़कियां और दरवाजा खुला रखा करता था।

हमीरपुर में अणु ग्राउंड के पास नीचे एक नाला है, उसी के बगल में हम लोगों ने क्वार्टर लिया हुआ था। मकान मालिक अलग बिल्डिंग में हीरानगर में रहता था, इस पुराने घर को उसने किराए पर लगा दिया था। मेरी ही तरह 4 और लड़के वहं रहते थे और सभी कोचिंग ले रहे थे। 2 मेरे परिचित थे और 2 से जान पहचान नहीं थी। सबके लिए अलग कमरे थे। मेरा कमरा सबसे आखिर में था, जिसके बाद नीचे घना नाला शुरू हो जाता था। सच बताऊं तो मैं इस वक्त लिखते वक्त भी कांप रहा हूं। रह-रहकर कंधों के पीछे झुरझुरी हो रही है इसे लिखते हुए। खैर, एक रात मैं बैठा हुआ था कुछ तैयारी करने। रात के 1 बज रहे होंगे। मैंने देखा कि बाहर से कोई गुजरा। मैने सोचा बगल के कमरे वाले लड़के टहल रहे होंगे कि क्योंकि रात भर जागना आम था। बड़ा दरवाजा खुला था और सिर्फ जाली वाला दरवाजा लगा हुआ था। बाहर की लाइट बंद थी, बस मेरे कमरे की लाइट ही बाहर तक दिख रही थी। तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया। बाहर देखने में एक आकृति सी नजर आई जो एक लड़की की तरह थी। मैं थोड़ा चौंका तो जरूर, मगर बोला कि कौन। मैंने ध्यान नहीं दिया और सोचा कि बगल वाला लड़का ही होगा और कम रोशनी की वजह से लड़की की तरह दिख रहा है। मैं फिर से किताब में डूबा और बोला कि आ जाओ, दरवाजा खुला है। दरवाजा खुला और कनखियों से मुझे दिखा कि कोई अंदर आकर खड़ा हो गया। मैंने देखा कि एक 16-17 साल की लड़की खड़ी है मुस्कुराते हुए। मैं हैरान और अचंभित।

मैंने कहा कि जी, बताइए। वो मुस्कुराते हुए बोली- सॉरी, इतनी रात को आपको डिस्टर्ब करने के लिए। आप **** कोचिंग सेंटर से ही कोचिंग ले रहे हो न? मैंने कहा- जी हां। वह बोली- मैं भी वहीं से कोचिंग ले रही हूं। मैं शाम वाले बैच में हूं। आपको देखा था कोचिंग में और फिर शाम को यहीं आते देखा। मैं भी दरअसल बगल में रहती हूं और कोचिंग कर रही हूं। मैंने सोचा कि आसपास ही कहीं रहती होगी। मन में कोई और बात आई नहीं, फिर भी पूछा कि इतनी रात को आप यहं कैसे? वह बोली- बात ऐसी है कि कल हमारा मॉक टेस्ट है और मेरे पास किताब नहीं है ऑब्जेक्टिव फिजिक्स की। मैंने सोचा कि थोड़ा रिविज़न कर लूं, मगर…। ऐक्चुअली आपसे क्या छिपाना कि मैंने आपके पास वो किताब देखी थी। मेरे मन में कुछ और नहीं सूझा तो मैं रात को ही आपके पास चली आई। मेरी मम्मी-पापा को बड़ी उम्मीदें हैं उनसे। किताब नहीं खरीद सकते वो तो बोल नहीं सकती। तो आप हेल्प कर देंगे तो बहुत मेहरबानी होगी।

मेरा भी अगले दिन फिजिक्स का ही टेस्ट था। मगर लड़की ने जितनी मासूमियत से बात कही, मैंने सोचा कि दे देता हूं किताब। फिर भी मैंने कहा- देखिेए किताब तो मैं दे दूंगा, मगर मैं आपको जानता नहीं। ऊपर से महंगी किताब है और मैंने भी किसी तरह से बड़ी मुश्किल से खरीदी है। इसपर लड़की बोली- अरे आप परेशान मत हो, मैं 2 दिन बाद आपको किताब दे दूंगी। इसी वक्त आकर दूंगी। तब तक शायद आपको फिजिक्स का कोई टेस्ट भी नहीं होगा। मेरा नाम ममता (नाम बदल रहा हूं) है और मैं शाम वाले बैच हू्ं। बीच में किताब चाहिए होगी तो शाम को ले लेना आप आकर। मैंने सोचा कि बात ठीक है। मेरा कल का ही टेस्ट है और उसकी तैयारी लगभग हो गई है और कुछ देर में सोना है। फिर इस किताब की जररूत हफ्ता भर तो पड़ेगी नहीं। मैंने उस लड़की को किताब दे दी और कहा कि वक्त पर लौटा देना।

पता नहीं मैंने क्यों और कैसे वो किताब दे दी। शायद मैं नींद में था या शायद वो लड़की थी, इसलिए पिघल गया। मगर मैंने किताब दे दी। किताब लेते ही वह मुस्कुराई और मुड़कर चली गई। वैसे ही जैसे आई थी। मैं बैठकर उसे जाते हुए देखता रहा। उसके जाने के बाद मैं आराम से सो गया। अगले दिन मॉक टेस्ट के बाद अपने साथ रहने वाले लड़कों को मैंने रात का किस्सा सुनाया। वे हंसने लगे कि साला लड़की के चक्कर में किताब दे गया, अब नहीं मिलने वाली किताब। पता नहीं कौन ले गई इससे किताब। मैं परेशान हो गया। मन में शंका हुई कि कहीं वाकई किताब हाथ से चली तो नहीं गई। मैंने सोचा कि दिल की तसल्ली के लिए थोड़ा रुककर देख लूं कि ममता आ रही है आज शाम के बैच में नहीं। मैं रुका रहा और देखता रहा कि कौन-कौन शाम के बैच में आया है। हर बैच में जाकर देख आया, मगर ममता नहीं दिखी। कुछ लड़कियों से ममता के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा पता नहीं। अब भला सब कोचिंग लेने बाहर से आए हैं, सबका नाम किसे पता होगा। थक हारकर मैं कैशियर के पास गया और उसे बोला कि भाई ममता नाम की लड़की है ईनविंग बैच में, उसने किताब ली है, उसके बारे में थोड़ी जानकारी दे दो। कैशियरर ने पहले आनाकानी की मगर फिर वह रजिस्टर टटोलने लगा। उसने 2 ममता नाम की लड़कियों का नाम और बैच नंबर मुझे दिया।

मैं तुरंत कोचिंग सेंटर में हर कोचिंग रूम में जाकर ममता नाम की लड़कियों का पता करने लगा। दोनों लड़कियां मिलीं, मगर उनमें से कोई भी वह ममता नहीं थी, जो रात को मिली थी। अब मैं तनाव में आ गया था। मैं सोच रहा था कि किसी ने बेवकूफ बनाकर मेरी किताब पर हाथ साफ कर लिया। मैं फिर कैशियर के पास गया और बोला कि बाई देख लो कोई और ममता तो नहीं है। वह इरिटेट होकर मुझपर चिढ़ गया। मैंने भी गुस्से और फ्रस्ट्रेशन में उसे कुछ कहा और तू-तू, मैं-मैं हो गई। वह बाहकर आकर मुझे ललकारने लगा और मेरा कॉलर पकड़ लिया। मैंने भी उसे धक्का देकर गिरा दिया। मामला बढ़ गया औऱ शोर-शराबा सुनकर पूरा स्टाफ और बहुत से बच्चे वहां इकट्ठे हो गए। लोगों ने पूछा कि क्या हुआ, मैंने पूरी बात कह सुनाई कि ऐसा-ऐसा हुआ, ममता नाम की लड़की मेरी किताब ले गई और ये जनाब उसके बारे में बता नहीं रहे। इतने में वहां केमिस्ट्री की कोचिंग देने वाले टीचर (नाम नहीं बता सकता) ने लोगों को वहां से जाने को कहा और मुझे स्टाफ रूम ले गए।

इत्मिनान से पानी पिलाकर पूछा कि बात क्या है। मैंने बात बताई तो वह गंभीर हो उठे। उन्होंने कैशियर को बुलाया और कुछ कहा। एक घंटे बाद कैशियर एक फाइल लेकर आया और उसे केमिस्ट्री के टीचर को दे दिया। केमिस्ट्री के टीचर ने वो फाइल मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा- इसे देखो। मैंने फाइल खोली। यह ऐडमिशन की फाइल थी, जिसमें ऐडमिशन फॉर्म, फीस की रीसीट और फोटो वगैरह मैनटेन की जाती है। फाइल खोली तो ममता वर्मा नाम की लड़की का नाम लिखा था और एक फोटो लगी थी। फोटो देखते ही मैं चहका कि हां यही लड़की है, इसी ने मेरी बुक ली है। देख रहा था कि मेरे यह कहने का केमिस्ट्री टीचर के चेहरे पर कोई असर नहीं पड़ा, बल्कि वह और गंभीर हो गए। उन्होंने कहा कि ऐसा ही नहीं सकता कि यह लड़की तुम्हारी किताब ले। मैंने कहा नहीं, मैं अच्छे से पहचान रहा हूं, इसी ने किताब ली है। उन्होंने लंबी सांस छोड़ते हुए कहा- यह लड़की अब इस दुनिया में नहीं है। मैंने कहा सर मजाक छो़ड़िए, यही लड़की है। बताइए कि कौन है, कहां की है। और मुझे लगता है कि आप इसे जानते हैं। बस आप मेरी किताब दिलवा दीजिए। टीचर ने कहा- हां, मैं इसे जानता था। जाहू के पास की थी और पिछले साल यहं आई थी। यहीं कोचिंग करती थी, एक साल ड्रॉप किया था। टेस्ट दिया था इसने, मगर रिजल्ट आने से पहले ही जंगल में इसकी लाश पाई गई थी।

मैंने कहा कि सर हो सकता है आपको गलतफहमी हो रही हो। तो सर ने कहा कि मेरी बात पर यकीन नहीं है तो इस फॉर्म में दिए घर के नंबर पर कॉल करके देख लो। मैं दौड़ा-दौड़ा गया और अपने दोस्त से नोकिया 1100 लेकर आया। उसमें घर का नंबर मिलाया। रिंग जाने के बाद एक महिला ने फोन उठाया औऱ मैंने बोला कि मैं ++++ कोचिंग सेंटर से बोल रहा हूं और ऐसे-ऐसे आपकी बेटी ममता ने मेरी किताब ली है और अब उसका कुछ पता नहीं चल रहा। महिला ने कहा दोबारा बकवास मत करना और फोन काट दिया। मैं परेशान हो गया। मैंने फिर फोन उठाया तो इस बार कोई पुरुष था, मैंने बोला कि सर पूरी बात सुनो— ऐसा-ऐसा हुआ मेरे साथ और अब मुझे किताब चाहिए। उधर से आवाज आई- बेटा, ऐसा मजाक मत करो, जो भी हो तुम। हमारी बेटी जब इस दुनिया में है ही नहीं तो किताब कहां से ले लेगी। ये सुनकर पहली बार मेरा सिर चकराया और अजीब लगने लगा। अजीब से भाव आए। पसीना पड़ गया और कलेजा कांप गया। अब लगने लगा था कि सब बातें गलत थीं। उस लड़की की मुस्कान मेरे चेहरे के सामने आने लगी और मैं वहीं बेहोश हो गया।

मुझे कुछ याद नहीं कि क्या हुआ। जब मुझे होश आया तो मैंने खुद को अस्पताल के बिस्तर में पाया और आसपास मेरे दोस्त, केमिस्ट्री वाले टीचर और दो महिला-पुरुष खड़े थे। पता चला कि मैं 6 घंटों से बेहोश था और सिविल हॉस्पिटल मुझे लाया गया है। बातचीत में पता चला कि सामने खड़े महिला-पुरुष दरअसल उसी ममता के मां-बाप हैं, जो इस दुनिया में नहीं है। मैं डरा हुआ तो था, मगर साथ में एक अजीब सी फीलिंग थी कि ऐसा हो ही नहीं सकता। होश मेें आने पर मैंने कहा कि मैं एकदम ठीक हूं और हॉस्टल जा सकता हूं। अच्छी बात यह थी कि मेरे मम्मी-पापा को किसी ने फोन नहीं किया था। इससे पहले कि मैं जाता, उस बुजुर्ग पति-पत्नी ने मेरे आगे हाथ जोड़े और बोले बेटा, क्या हुआ तुम्हारे साथ हमें भी बता दो। मैं इस बारे में हालांकि बात नहीं करना चाहता था, मगर मैंने पूरी कहनी कह सुनाई। देखा कि उस महिला-पुरुष की आंखों से आंसू आ रहे थे बात सुनते हुए। उन्होंने बताया कि बेटा गलती हमारी है। हम उसे जबरन डॉक्टर बनाना चाहते थे और इसीलिए उसे भेजा था। वह कुछ और करना चाहती थी, मगर हमने उससे एक साल ड्रॉप भी करवाया। उसने टेस्ट दिया और प्रीलिम्स पास भी कर दिया, मगर उससे पहले ही हमारी बेटी की लाश हमें जंगल में मिली। पोस्टमॉर्टम में कुछ पता नहीं चल पाया कि क्या हुआ। उसने जहर खाया या कोई जंगली जानवर ले गया या कुछ और हुआ या मर्डर हुआ उसका। क्योंकि लाश कई दिन बाद मिले और जंगली जानवरों ने नुकसान पहुंचाया था।

मैंने उन्हें बताया कि उस लड़की ने कहा कि मैं दो दिन बाद आपको यह किताब देने आऊंगी इसी वक्त। यानी कल रात को वह आने वाली थी। मुझे यकीन था कि इतना सब कुछ होने के बाद वह नहीं आएगी। मुझे यह भी लग रहा था कि हो सकता है मुझे सारा का सारा भ्रम हुआ हो, क्योंकि मैं भी प्रेशर ले रहा था पढ़ाई का। जबरन जागकर तैयारी कर रहा था और हो सकता है कि ममता का आना और किताब ले कर जाना भ्रम् हो और मुझे ही कोई मानसिक समस्या हो गई हो। मैंने कुछ फिल्में देखी थीं, जिनमें पता चलता था कि जिस शख्स को भूत दिखते हैं, दरअसल उसका अपना दिमाग खराब होता है और किसी समस्या की वजह से वह कल्पना करने लगता है। मगर जिस ममता को मैं जानता नहीं था, उसका ही संयोग से भ्रम क्यों हुआ मुझे? यही ख्याल मुझे पागल होने से बचा रहा था। खैर, उस लड़की के मम्मी-पापा ने मुझसे कहा कि बेटे अगर वो आती है तो तुम उससे एक बात पूछना कि तुम्हारी मौत कैसे हुई थी। मैंने कहा कि मेरा दिमाग खराब है क्या? मैं जा रहा हूं घर, भाड़ में जाए कोचिंग और भाड़ में जाए आपकी बात। मैंने तुरंत घर फोन किया और घरवालों को सारी कहानी कह सुनाई। उन्हें मेरी कहानी पर यकीन नहीं हुआ। उन्हें लगा कि मैं ही कोचिंग नहीं लेना चाहता और मनगढ़ंत कहानी सुनाकर घर लौटना चाहता हूं। घर से सख्त हिदायत मिली कि जहां मर्जी जाओ, घर मत लौटना कोचिंग लिए बगैर। मैं चिल्लाता रहा और समझाता रहा घरवालों को, मगर उन्होंने एक नहीं सुनी। उन्हें लग रहा था कि मैं शरारती हूं और यह भी मेरी कोई शरारत है। खैर, मेरे पास कोई चारा नहीं था। वह रात तो मैंनंे अस्पताल में काटी, अगली रात अस्पताल से कोचिंग सेटर गया और वहां से अपने उसी रूम में, जहं दो दिन पहले ममता से मुलाकात हुई थी।

आज रात वह आने वाली थी। मुझे लग रहा था कि वह अगर भूत है तो अपना राज खुलने पर नहीं आएगी। और अगर कोई औऱ ममता हुई तो आ भी सकती है। उस रात मैं अपने रूम पर बैठा और बगल में रहने वाले लड़कों को कहा कि भाई बाहर नजर रखना, जैसे ही तुम्हारे रूम से होकर कोई लड़की आए, मुझे मिस कॉल दे देना (दोस्त का नोकिया 1100 मैंने अपने पास रख लिया था और दूसरा दोस्त उसपर रिंग करने वाला था।)। मेरा ध्यान पढ़ाई पर कम, दरवाजे पर ज्यादा था। पढ़ाई का तो नाटक हो रहा था। जेब में हनुमान चालीसा रखी ती और सामने शिवजी की तस्वीर। मन में भगवान का नाम जपे जा रहा था। 1 बजे तक कोई हलचल नहीं हुई। मैं समझ गया कि या तो भ्रम था या कोई और लड़की वाकई मेरी किताब लेकर गई मुझे ममता के नाम पर उल्लू बनाकर।

मै बगल वाले कमरे में गया, नोकिया 1100 लौटाया, अपने कमरे में आया और लाइट ऑफ करके लेट गया। एक मिनट ही हुआ था कि किसी ने दरवाजा खटखटाया। मैंने सोचा कि वही दोस्त आए होंगे। बेबाकी से मैं उठा और तुरंत लाइट ऑन की और दरवाजा खोला। जैसे ही दरवाजा खोला, सामने ममता खड़ी थी। वही मुस्कुराहट लेकर और हाथ में ऑब्जेक्टिव फिजिक्स की किताब लेकर।

मैं हक्का-बक्का था। यह वही ममता थी जो उस दिन आई थी और जिसकी तस्वीर मैंने साल भर पुराने फॉर्म में देखी थी। मैं सन्न था और मेरे मुंह से कोई शब्द नहीं फूट रहा था। उसने कहा कि कया हुआ, मैंने कहा कुछ नहीं। मैं वहीं सन्न खड़ा था। मानो शरीर में कोई जान ही नहीं। मैं हिल-डुल नहीं पाया। उसने फिर कहा- किताब नहीं चाहिए। मैं इस बीच सोचने लगा कि यह लड़की मरी हुई हो ही नहीं सकती। मैंने उसके पांवों पर नजर दौड़ाई, जो सीधे थे। उसकी आंखें देखीं जो भूतों की तरप सफेद नहीं थी। उसके बालों को ध्यान से देका तो वे उड़ ररहे थे हवा के झोंकों से। उसके कपड़े असली थे, उसकी आवाज, शरीर सब असली था। मैं अजीब स्थिति में था। कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने कहा- आप ठीक हो। मैंने कहा- हां। यह पहला मौका था जब उसके आने के बाद मेरे मुंह से शब्द फूटे थे। तो किताब रख दूं टेबल पर। मैंने कहा हां, क्यों नहीं। मैं एक तरफ हटा और वह मेरे कमरे में दाखिल हो गई और टेबल पर किताब रख दी।

अब मेरे मन में दो विचार आ रहे थे। एक- या तो मैं दरवाजे से निकलकर भाग जाऊं या फिर रुकूं और इस लड़की से बात करके देखूं। मगर किसी तरह मैने हिम्मत की और रुक गया। मैं आकर अपने बिस्तर पर बैठा और स्टडी टेबल की कुर्सी टेबल के साथ खड़ी उस लड़की की तरफ बढ़ाते हुए कहा- बैठो, खड़े क्यों हो। उसने कहा नहीं, जाना है, देर हो जाएगी। मैंने कहा-मुझे तो लगा था कि आप आएंगी ही नहीं। मैंने तो कोचिंग सेंटर जाकर आपके बारे में मालूमात हासिल की तो कोई जानकारी नहीं। जब मैं यह बोल रहा था तो उस लड़की के चेहरे की मुस्कान गायब होती जा रही थी और वह बहुत गंभीर हो चुकी थी। मैंने उसे बताया कि कैसे मैं एक लड़की के माता-पिता से मिला, जिसने कहा कि तुम हमारी बेटी हो और मर चुकी हो। मैं जब यह कह रहा था तो उस लड़की ने अपना सिर झुका लिया था और अपने दोनों हाथ एकसाथ अपनी गोद में रख लिए थे। वह बेचैन सी लग रही थी। मुझे घबराहट हो तो हो रही थी, मगर न उस लड़की के ठीक पीछे शिवजी की तस्वीर दिख रही थी।

मैं अजीब स्थिति में था। न तो यह फिक्र रही कि यह लड़की भूत हो सकती है और मुझे नुकसान पहुंचा सकती है और न ही यह चिंता कि मैं किसी और लड़की को गलत समझकर उसे भूत बताकर उसे हर्ट कर सकता हूं। मैंने उसे बताया कि लड़की के मम्मी-पापा ने मुझे तुमसे यह पूछने को कहा है कि तुम्हारी मौत कैसे हुई थी। प्रतीकात्म तस्वीर मेरा यह कहना था कि लड़की ने गर्दन उठाई और मेरी तरफ देखा। उसकी आंखों में आंसू थे। मुझे उस लड़की से डर नहीं लगा। मैं अजीब सा भावुक हो गया। उसने कहा मेरी मौत…. यह कहकर वह थोड़ा रुकी, आंखों के आंसू पोंछे, मुस्कुराई और बोली— मेरी मौत हो गई होती तो मैं आपसे सामने ऐसे थोड़े ही बैठी होती। मैं तो कभी मर भी नहीं पाऊंगी, जब तक मैं मम्मी-पापा का सपना पूरा न कर लूं। खैर, रात बहुत हो गई है। थैंक्यू किताब देने के लिए। आपको ऑल द बेस्ट। उसने यह कहा, मुस्कुराई और उठकर दरवाजे से बाहर चली गई।

मैं उसके पीछे-पीछे आया और दरवाजा खोलकर बाहर गलियारे में देखो तो कोई नहीं था। मैं घबराया और बगल वाले कमरे में गया, जहां लाइट जल रही थी। उन्हें पूरी कहानी सुनाई तो वे यकीन नहीं कर पाए। उन्होंने कहा कि मैं हम खिड़की से बाहर देख रहे थे, तुम्हारे कमरे की तरफ कोई नहीं गया। उन दोस्तों ने समझा कि मैं उनके साथ मजाक कर रहा हूं और यह बहानेबाजी है।

यह भी पढ़ें: मम्मी-पापा को बोलना कि बेलीराम मिला था

अगले ही दिन मैंने अपना सामान बांधा और हमीरपुर बाजार में एक पेइंग गेस्ट में शिफ्ट हो गया। कभी मुझे कोई डरावना सपना नहीं आया। होश में जरूर मैं उश वाकये को याद करके डरता रहा कई दिनों तक, मगर फिर अहसास हुआ कि मुझे कोई नुकसान नहीं पहुंचाया उसने, वह जो भी चीज़ थी। आज तक सोचता हूं कि वह क्या था। सपना था, मेरा भ्रम या वाकई कोई और ही लड़की थी ममता नाम की। उसके माता-पिता ने भी मुझसे कभी संपर्क नहीं किया और न मैंने इस मामले को हवा दी। मैं भी जीवन डगर में आगे बढ़ता गया। इंजिनियर तो मैं बना, मगर कोचिंग के जरिए नहीं, प्राइवेट कॉलेज में दाखिला लेकर और माता-पिता के पैसों से भारी-भरकम फीस भरकर। आज भी यह वाकया याद आता है तो डर लगने लगता है। मैं ममता की उस मुस्कान को भूल नहीं पाया हूं।

और रहस्मयी कहानियो के लिए फॉलो करें और कहानियों का लुफ्त उठाये।

Share: