“अपने मन को समझाऊँ कैसे ? 

आज मै खुशी की गीत गाऊँ कैसे ? 

मेरी भारत माँ को सदियों तक गुलाम बनाया रखा जिन्होंने;

देशभक्तों को बेझिझक फाँसी पर चढा दिया जिन लोगो ने,

मै उनकी संस्कृति का नया साल मनाऊँ कैसे ?”


“मेरी माँ से बढ़कर कोई नहीं है इस जहाँ में;

चाहे वो भारत माँ हो, या फिर जननी माँ;

वो जानते तक नहीं हमारा नूतन वर्ष कब होता है;

उन पराये लोगों की थोपी गयी सभ्यता को;

अपने त्योहारों की तरह मनाऊँ कैसे ?”


“कुछ लोग हँसेंगें मुझपर;

मेरी इस कविता को पढ़कर;

लेकिन पश्चिमी सभ्यता के गुलाम लोगों को;

अपनी संस्कृति भूलने वालों को;

अपने दिल की बात बताऊँ कैसे ?”


“खैर, आप खुश रहो, इस अवसर पर नाचो-कूदो;

पर मैं नहीं शिकार इस सभ्यता का, मुझे बधाईयाँ मत भेजो;

बुरा लगे तो कोई बात नहीं, मैं माफी माँगूगाँ, ये आशा मत करना;

खुद को कितना भी देशभक्त कहो, मैं तो गुलाम ही समझूगाँ;

आँखों पर पट्टी बाँधे लोगों को मैं संस्कृति का मतलब समझाऊँ कैसे ?”

©ReemaPrabhat

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नव वर्ष मनाऊँ कैसे?
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