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Pulling A Tooth

My dentist once told me that letting go is like putting a tooth. When it is pulled out, you’re relieved. But how many times does your tongue run itself over the spot where the tooth once was?

Probably a hundred times a day. Just because it was not hurting you doesn’t mean you did not notice it. It leaves a gap and sometimes you see yourself missing it terribly. It will take time to let go off the pain but it’ll be worth a wait.

Sooner or later you’ll question yourself that pulling the tooth was in vain or worth it?


It was causing you so much pain that letting it go off was the best decision.

In short, you have to be strong now. People will hurt you, shake you, blame you & leave you. You’ll have to stand alone for yourself, no matter how hard and painful it is, you have to let go off few situations, people & everything that brings you down.

Be strong now, because things will ultimately get better. It might be stormy now, but it can’t rain forever….

अधूरापन

मैं आज भी खुद से पहले तेरे लिए सोचता हूं

 मैं आज भी साँस से ज़्यादा तुझको ज़रूरी मानता हूं

 मैंने तो इश्क़ किया है
और इसे वफा से मैं निभाऊंगा 

तू चाहे बेवफाई क्यूं ना करले

 मैं तो सिर्फ तुझे ही चाहूंगा 

माना कि तुझे मुझसे प्यार ना था 

पर हमारे बीच इक रिश्ता दोस्ती का तो था

 तो कैसे तूने इतनी आसानी से कह दिया कि अब हम अनजान हैं? 

कैसे तूने इतनी आसानी से मुझे भूला दिया?

 गलती तेरी थी या मेरी, पता नहीं 

तूने जो कहा

मैंने वो किया

तेरे लिए अपना प्यार भी भुलाया

 तुझे अपना अच्छा दोस्त भी बनाया

 अपनी सभी बुरी आदतों को भी छोड़ा 

और सिर्फ वहीं किया जो तूने चाहा 

अब किसको बताऊं मैं दुख अपने 

किसको सुनाऊं ये अधूरे सपने

 ये जो तीर आकर सीने में चुभ रहे हैं

 किसको समझाऊं की कितना दर्द दे रहे हैं

 मैं भूल कर भी तुझको भूल नहीं पा रहा

 ऐसा जादू तूने मुखपर है किया 

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा

मैं सवाल भी खुद से पूछ रहा हूं

और जवाब भी खुद ही दिए जा रहा।

।।तमन्ना।।

मैं तो बैठा कुछ सोच रहा था

दुनिया के रंग देख रहा था

डूबा अपने ख्यालों में

इक अलग जहाऩ संजो रहा था।

उन्हें मेरे एक तरफ अमीरी खड़ी दिख रही थी

दूसरी तरफ उन्हें गरीबी झुकी दिख रही थी

ना जाने क्यूं उन लोगों के लिए ये नज़ारा अजब था

मुझे तो दोनों ही तरफ ममता दिख रही थी।

मेरे दोनों तरफ लड़कियाँ थी

दोनों ही गज़ब हस्तियाँ थी

दोनों की आँखों में कुछ नया जानने की वही इच्छा थी

अपने माँ बाप के लिए दोनों ही हूर पारियाँ थी।

दोनों के चेहरों की चमक अलग थी

दोनों की आवाज़ों की रूहानियत अजब थी

मेरे लिए तो दोनों ही 

उस खुदा की बनाई हसीन मूरत थी।

मैं तो बैठा कुछ सोच रहा था

दुनिया के रंग देख रहा था

डूबा अपने ख्यालों में

इक अलग ही जहान संजो रहा था।

मैंने तो चाहा था दोनों को मिलाना

एक अल्लाह और एक ऊँ को जोड़कर एकोंकार बनाना

लेकिन

ना चाहते हुए भी मैं उन दोनों के बीच की सरहद बन गया

मैंने ना अमीरी को इस तरफ आने दिया

ना गरीबी को उठकर उस तरफ जाने दिया

मैंने ना चाहते हुए भी उन दोनों को बांट दिया।

क्या कहूंगा जाकर उस भगवान को मैं

क्या मुंह दिखाऊंगा उस अल्लाह को

भेजा था जो पूरी करने उसने मुझे

मैं अधूरी छोड़ आया हूं उसकी उस तमन्ना को…?

मुझे

मुझे दुख इस बात का नहीं कि वो मेरे पास नहीं

मुझे दुख इस बात का है कि वो मेरे साथ नहीं।

।। महताब ।।

ये जो मज़हब के नाम पर तुम लड़ते हो

कभी पूछा है क्या तुमने उस चाँद को

कि उसका मज़हब क्या है?

ये करवाचौथ पर भी पूजा जाता है

ईद पर भी इसका सजदा किया जाता है

ये आसमां में भी आफ़ताब फैलाता है

इस जहाऩ में रौशनी भी ये लाता है

और मुख पर इतने दाग़ होने के बावजूद भी

बेदाग़ कहलाता है।

ईद पर ये महताब बनकर आता है

करवाचौथ पर ये चाँद बन जाता है

पर दोनो मज़हबों में 

पूजा यही जाता है।

चाहे आधा हो या पूरा हो

इसके बिना ना ईद हो

करवाचौथ भी अधूरा हो।

किस मज़हब के लिए तुम लड़ते हो?

क्यों धर्म के नाम पर बँटते हो?

इसको देखे बिना, ना हिंदू के हलक़ से निवाला उतरे

न मुसलमान कभी पूरा हो।

पहले की तरह।

पिछले कुछ सालों में 

बहुत बदल गयी है ज़िंदगी

और इस ज़िंदगी के साथ

 बदल गयी है तू भी

पहले तू हँसती थी

मुस्कुराती थी

और गाती भी थी।।।

तू अब भी हँसती है

लेकिन वो हँसी अब कुछ दबी दबी सी लगती है

तू अब भी मुस्कुराती है

लेकिन कोई तो ऐसा दर्द है जिसे तू छुपाती है

तू अब भी सुरीला बेहद गाती है

लेकिन शायद कुछ बात है जो तू गाकर मुझे बताती है

मैं समझ नहीं पाता हूँ

तू समझा नहीं पाती है

क्या बात है ऐसी

जो तू मुझे बताना चाहती है

लेकिन बता नहीं पाती है

क्यूँ तू आजकल यूँ डरी डरी सी रहती है?

क्यूँ तू उन लोगों की बातों में आती है?

क्यूँ तू उन लोगों की बातें सुनकर खुद को तड़पाती है?

क्यूँ तू सुन इन लोगों की बातें हर रोज़ घुट घुट कर मर जाती है?

क्यूँ नहीं तू पहले की तरह अब बेपरवाह रहती है?

क्यूँ नहीं तू पहले की तरह अब मुस्कुराती है?

क्यूँ तू आजकल यूँ डरी डरी सी रहती है?
क्यूँ तू आजकल यूँ डरी डरी सी रहती है?

।।इन्तज़ार।।

इन्तज़ार है मुझे उस दिन का

जिस दिन मेरा देश आज़ाद हो जाएगा

अंग्रेज़ गये थे छोड़ कर जब

उस दिन मेरा देश आज़ाद कहलाया था

लेकिन मुझे इन्तज़ार है उस दिन का

जिस दिन मेरा देश आज़ाद हो जाएगा।

दलालों से भरी सरकारें हैं

औरतों पर ज़ुल्म ढेर सारे हैं

मंत्री हमारे भ्रष्ट कयी सारे हैं

फिर भी आज़ाद भारत के नागरिक कहला रहे हैं

मुझे इन्तज़ार है उस दिन का

जिस दिन हर व्यक्ति भारतीय कहलाएगा

मुझे इन्तज़ार है उस दिन का

जिस दिन न कोई हिन्दू मस्जिद तोड़ेगा

न कोई मुसलमान मंदिर तुड़वाएगा

और न कोई RSS वाला भगवां लहराएगा

मुझे इन्तज़ार है उस दिन का

जिस दिन हर व्यक्ति लिए हाथ में तिरंगा

खुद को भारतीय बताएगा

मुझे इन्तज़ार है उस दिन का

जिस दिन हर व्यक्ति लिए हाथ में तिरंगा

खुद को भारतीय बताएगा।।

The Golden Bird

Oh! Meu land of gold

What have they done to thee

Even the British didn’t tale away

What thy people have taken from thee.

Those who came from farlands

Acknowledged thy beauty

And added

A lot more grace to thee.

But thy people

Have become so mean

They are just interested

In filling their pockets with green.

Where are we going?

What are we heading towards?

Is this the same India

Which was called, “The Golden Bird “?!!

।।हिंद।।

आज उन वीरों को याद करो

उन देशभक्तों की पुकार सुनो

शौर्य को अपने तुम जगाओ

भारत को अपने तुम सजाओ

रक्शक बनकर इस आज़ादी के

अपने देश के गौरव को तुम बढाओ

राष्ट्रगीत गाओ

तिरंगा लहराओ

आज़ादी के इस पर्व पर

उन क्रांतिकारियों की शहादत को सलाम करो

हो सके, ज़्यादा नहीं ओ थोड़ा ही

उन शहीदों के गुणों का स्वीकार करो

उन वीरों को मिलकर याद करो

उनकी शहादत को दिल से सलाम करो

उनकी वीरता के गुणगान करो

उन्हें आज तुम याद करो

उनकी शहादत को प्रणाम करो।।

।।आज़ादी।।

जिसका शेर सा था हौंसला 

जिसकी हाथियों सी थी चाल

मौत भी डरती थी मिलाने को नज़रें जिसके साथ

वो वीर था

वो शेर था

वो शहीद-ए-आज़म भगत सिंह था

उसके जैसा सूरमा

न किसी माँ ने कभी जनमा

न कभी जनमेगी कोई माँ

ये आज़ादी उससे है

ये देश उससे है

फिर क्यों भूल गये उसकी शहादत को

क्यों करते हो याद सिर्फ़ नेहरू और गाँधी बापू को?

उसकी वीरता को सलाम करो

उसकी शहादत को प्रणाम करो

चढ गया फाँसी जो तुम्हारे लिए हँसते हँसते

उसे भी तुम कभी याद करो

उसे भी तुम कभी याद करो।।